बाल मजदूरी पर निबंध



बाल मजदूरी भारत में गैरकानूनी है। फिर भी ऐसा पाया गया है कि भारत में कई जगह पर यह प्रथा कई रूपों में प्रचलित है। बाल मजदूरी एक अमानवीय प्रथा है। बाल मजदूरी में बड़े लोग बच्चों से कुछ पैसों के लिए जबरन काम कराते हैं और बच्चों का बचपन छीन लेते हैं। अब लोगों में जागरूकता आने की वजह से बाल मजदूरी भारत में काफी कम हो गया है, लेकिन फिर भी कहीं-कहीं बाल मजदूरी हो रही है। बाल मजदूरी की वजह से बच्चों का समुचित विकास नहीं हो पाता है।

किसी भी इंसान का बचपन उसके विकास के लिए एक अत्यंत महत्वपूर्ण समय होता है। यही वह समय है जब बच्चे नई-नई चीजों को खेल-खेल में और देखकर सीखते हैं। इस समय बच्चे स्कूल जाते हैं और पढ़ाई करके बहुत कुछ सीखते हैं। बच्चों को अलग-अलग चीज सीखने के लिए बहुत खाली समय देना पड़ता है और यही सीख उन्हें आगे चलकर काफी काम आता है। ऐसे बच्चों का शारीरिक और मानसिक विकास अच्छे से हो पाता है।

लेकिन कुछ लोग बच्चों से कुछ पैसों के लिए मजदूरी कराते हैं। उन लोगों को यह समझ में नहीं आता है कि बच्चों से मजदूरी कराकर कुछ पैसे तो मिल जाते हैं, लेकिन उस बच्चे का जीवन बर्बाद हो सकता है। कम उम्र में मजदूरी की वजह से बच्चों का शारीरिक और मानसिक विकास अच्छे से नहीं हो पाता है। बच्चों का शरीर बहुत ज्यादा श्रम करने के लिए नहीं बना होता है।

बाल मजदूर अपने बचपन में कुछ नया पढ़ने और खेलने की जगह फैक्ट्रियों, घरों या फिर खेतों में छोटे-मोटे काम करते हैं और वह मानसिक तौर पर काफी दुखी हो जाते हैं और शारीरिक तौर पर भी काफी थक जाते हैं, ऐसे में यह बच्चे पढ़ाई भी नहीं कर सकते हैं।

फैक्ट्रियों में काम करने की वजह से कुछ बच्चों में कई तरह की बीमारियां भी हो जाती है और गरीबी के कारण ज्यादातर बच्चों का इलाज भी नहीं हो पाता है।

बच्चे ज्यादा बोल नहीं पाते हैं तो इसका अनुचित लाभ उठाते हुए माता-पिता को बच्चों से बाल मजदूरी नहीं कराना चाहिए। बाल मजदूरी के नुकसान को समझने के लिए माता-पिता को समझदार होना पड़ेगा। भारत के सभी लोगों का कर्तव्य है कि वह जब भी बाल मजदूरी की प्रथा को देखें तो उसे तुरंत रोकने का प्रयास करें, क्योंकि यह बच्चे ही भारत का भविष्य है। यदि बच्चों का बचपन ही छीन लिया जाएगा तो वह बड़े होकर भारत के विकास में भागीदार नहीं बन सकते है।

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